कविता

पगडंडी

 

शाम का धुंधलका गहराते ही

सिमट कर सिकुड़ गई

कच्ची पगडंडी

दुबक कर छुप गई

पेड़ों के पीछे…

पक्का रास्ता

और भी इठलाया,

उभर आया सामने

खड़ा हो गया

सीना ताने…

 

मंजूषा मन

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